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90 दिनों में कैसे टूटा मिसिर बेसरा का नेटवर्क? मुठभेड़ से गिरफ्तारी तक Inside Story

29 अप्रैल 2026 की सारंडा मुठभेड़ से शुरू हुए घटनाक्रम के बाद कैडरों के आत्मसमर्पण, खुफिया नेटवर्क और लगातार सुरक्षा अभियानों के बीच शीर्ष माओवादी मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी तक की पूरी कहानी।

ऑपरेशन ‘सारंडा ब्रेक’: 90 दिनों में कैसे ढह गया 2 करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा का साम्राज्य?

29 अप्रैल की मुठभेड़ से शुरू हुई कहानी, बिखरता कैडर, खुफिया नेटवर्क और आखिरकार गिरफ्तारी तक… झारखंड में माओवाद के सबसे मजबूत गढ़ों में शामिल सारंडा में चले अभियान की पूरी कहानी

वरिष्ठ पत्रकार सोहन सिंह | रांची

जंगल खामोश था, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियां तेज हो चुकी थीं। सारंडा के घने जंगलों में बंदूकें भले कुछ समय के लिए शांत हुई हों, लेकिन पर्दे के पीछे एक बड़े अभियान की जमीन तैयार हो रही थी।

29 अप्रैल 2026 को पश्चिमी सिंहभूम के रूटुगुटू और बोरोई के जंगलों में शुरू हुई मुठभेड़ आने वाले करीब तीन महीनों में माओवादी संगठन के लिए निर्णायक साबित हुई। तीन दिनों तक चले अभियान में इनामी माओवादी इस्राइल पूर्ति उर्फ अमृत पूर्ति के मारे जाने के बाद संगठन के भीतर दबाव बढ़ा और सारंडा में सक्रिय नेटवर्क के बिखरने की शुरुआत हुई।

इसके बाद सुरक्षा बलों के लगातार अभियान, खुफिया सूचनाओं, कैडरों के आत्मसमर्पण और शीर्ष नेतृत्व पर केंद्रित कार्रवाई का सिलसिला तेज हुआ। आखिरकार सुरक्षा एजेंसियां माओवादी संगठन के शीर्ष नेता और करीब दो करोड़ रुपये के इनामी मिसिर बेसरा तक पहुंच गईं।

यह कहानी सिर्फ एक गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि उस नेटवर्क के कमजोर पड़ने की है, जिसने वर्षों तक सारंडा के जंगलों में माओवादी नेतृत्व को सुरक्षा कवच दे रखा था।

29 अप्रैल: जब पहली बार कमजोर पड़ा सारंडा का मजबूत किला

29 अप्रैल 2026 को टोंटो और गोईलकेरा थाना क्षेत्र के रूटुगुटू और बोरोई के जंगल गोलियों की आवाज से गूंज उठे।

करीब तीन दिनों तक चले अभियान में सुरक्षा बलों ने माओवादियों के कई ठिकानों को निशाना बनाया। इसी कार्रवाई में इनामी माओवादी इस्राइल पूर्ति उर्फ अमृत पूर्ति मारा गया।

सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह कार्रवाई केवल एक माओवादी के मारे जाने तक सीमित नहीं थी। इसके बाद संगठन की गतिविधियों, संपर्कों और मूवमेंट को लेकर मिलने वाली सूचनाओं ने संकेत देना शुरू किया कि सारंडा में लंबे समय से बना सुरक्षा कवच कमजोर पड़ रहा है।

जंगल के भीतर बैठक, सवाल था- क्या सारंडा अब भी सुरक्षित है?

मुठभेड़ के बाद माओवादी नेतृत्व के भीतर सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी। सूत्रों के मुताबिक, संगठन के स्तर पर इस बात पर मंथन हुआ कि लगातार बढ़ते सुरक्षा अभियानों के बीच सारंडा में बने रहना कितना सुरक्षित है।

सुरक्षा बलों की घेराबंदी, खुफिया गतिविधियों और लगातार ऑपरेशन के कारण अलग-अलग दस्तों की गतिविधियों में बदलाव आने लगा।

कुछ कैडर दूसरे इलाकों की ओर जाने लगे। कभी माओवादी नेतृत्व के लिए सबसे सुरक्षित इलाकों में गिना जाने वाला सारंडा धीरे-धीरे दबाव के घेरे में आता चला गया।

‘जिसे जाना है, चला जाए’… कैडरों के टूटने से बढ़ी मुश्किल

इसी दौरान संगठन के भीतर निराशा और असुरक्षा की स्थिति भी बढ़ने लगी। कई कैडरों के आत्मसमर्पण की इच्छा जताने की बात सामने आई।

सूत्रों के अनुसार, मिसिर बेसरा की ओर से भी ऐसे कैडरों को रोकने की पहले जैसी कोशिश नहीं हुई। इसके बाद कई सदस्यों ने संगठन छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का रास्ता चुना।

लगातार होते आत्मसमर्पण ने संगठन को दोहरा नुकसान पहुंचाया। एक तरफ उसकी जमीनी ताकत कम हुई, दूसरी तरफ स्थानीय नेटवर्क और संपर्कों के कमजोर पड़ने का खतरा बढ़ता गया।

गिरिडीह-पारसनाथ में नेटवर्क खड़ा करने की कोशिश?

सारंडा में बढ़ते दबाव के बीच मिसिर बेसरा के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन के लिए नया सुरक्षित क्षेत्र तलाशने की थी।

सूत्रों के मुताबिक, उसकी योजना गिरिडीह और पारसनाथ क्षेत्र के आसपास पुराने नेटवर्क को फिर सक्रिय करने की थी। इसी रणनीति के तहत शीर्ष माओवादी अजय महतो की गतिविधियां भी उस इलाके में बढ़ी थीं।

लेकिन सुरक्षा एजेंसियां पहले ही सक्रिय हो चुकी थीं।

अजय महतो की गिरफ्तारी ने इस रणनीति को बड़ा झटका दिया। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों का फोकस सीधे मिसिर बेसरा की गतिविधियों और उसके संपर्क नेटवर्क पर बढ़ गया।

सारंडा से गिरिडीह तक खुफिया नेटवर्क सक्रिय

सुरक्षा एजेंसियों ने सारंडा से बाहर निकलने वाले संभावित रास्तों और माओवादी संपर्कों पर निगरानी बढ़ा दी।

मानवीय खुफिया सूचनाओं और अन्य इनपुट के आधार पर सुरक्षा बल लगातार संगठन की गतिविधियों को ट्रैक करने में जुटे थे।

इसी दौरान सुरक्षा एजेंसियों को मिसिर बेसरा की आवाजाही से जुड़ा महत्वपूर्ण इनपुट मिला।

सूत्रों के मुताबिक, जानकारी मिली कि मिसिर बेसरा अपने कुछ साथियों के साथ एक वाहन से गिरिडीह की दिशा में बढ़ रहा है।

इसके बाद सुरक्षा बलों ने कार्रवाई करते हुए उसे साथियों समेत पकड़ लिया।

जिस नेटवर्क पर भरोसा था, वही बिखर चुका था

दशकों तक जंगलों में सुरक्षा बलों को चुनौती देने वाला मिसिर बेसरा आखिरकार गिरफ्त में था।

सूत्रों के मुताबिक, गिरफ्तारी के बाद उससे जुड़े नेटवर्क और सुरक्षा एजेंसियों की लंबे समय से चल रही निगरानी को लेकर भी उसे जानकारी दी गई। दावा है कि इस दौरान उसे बताया गया कि सुरक्षा एजेंसियां काफी समय से उसकी गतिविधियों और संपर्कों पर नजर रख रही थीं।

इस घटनाक्रम ने एक बात स्पष्ट कर दी—जिस स्थानीय और संगठनात्मक नेटवर्क को माओवादी नेतृत्व अपना सबसे बड़ा सुरक्षा कवच मानता था, उसमें बड़ी सेंध लग चुकी थी।

आत्मसमर्पण, गिरफ्तारी और खुफिया कार्रवाई ने बनाया दबाव

सारंडा में बदले हालात को किसी एक मुठभेड़ या गिरफ्तारी का परिणाम मानना पूरी तस्वीर नहीं होगी।

पिछले कुछ महीनों में सुरक्षा बलों की रणनीति कई स्तरों पर चली। एक ओर जंगलों में अभियान तेज हुए, दूसरी ओर आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के जरिए कैडरों को मुख्यधारा में लौटने का अवसर दिया गया।

इसके साथ ही शीर्ष नेतृत्व के संपर्कों और आवाजाही पर खुफिया निगरानी बढ़ाई गई।

इसका असर यह हुआ कि संगठन के सामने सुरक्षित ठिकानों, भरोसेमंद कैडरों और स्थानीय नेटवर्क—तीनों की चुनौती एक साथ खड़ी हो गई।

सारंडा के इतिहास का निर्णायक मोड़?

सारंडा का नाम दशकों तक झारखंड में माओवादी प्रभाव के सबसे मजबूत इलाकों में लिया जाता रहा है। घने जंगल, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां और स्थानीय स्तर पर तैयार नेटवर्क इसे माओवादी नेतृत्व के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाते रहे।

लेकिन लगातार सुरक्षा अभियानों, खुफिया रणनीति, आत्मसमर्पण अभियान और शीर्ष कमांडरों पर केंद्रित कार्रवाई ने परिस्थितियां बदल दी हैं।

कैडर बिखरे, कई कमांडर गिरफ्तार या मारे गए और संगठन का शीर्ष नेतृत्व लगातार दबाव में आता गया।

मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी इसी लंबे अभियान की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक मानी जा रही है।

29 अप्रैल की मुठभेड़ से शुरू हुआ घटनाक्रम करीब 90 दिनों में उस मुकाम तक पहुंचा, जहां कभी सारंडा के सबसे प्रभावशाली माओवादी चेहरों में शामिल मिसिर बेसरा सुरक्षा एजेंसियों की गिरफ्त में था।

यह गिरफ्तारी माओवादी संगठन के लिए सिर्फ नेतृत्व का नुकसान नहीं है। इससे सारंडा और आसपास के क्षेत्रों में वर्षों से तैयार किए गए उसके संगठनात्मक ढांचे और प्रभाव को भी बड़ा झटका लगा है।

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