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झारखंड राज्यसभा चुनाव में परिमल नथवानी की एंट्री से बदला खेल, कांग्रेस की बढ़ी चिंता

राज्यसभा चुनाव: नथवानी के मैदान में उतरते ही सियासी समीकरण बदले

झारखंड राज्यसभा चुनाव: परिमल नथवानी की एंट्री से बदला पूरा खेल, कांग्रेस की बढ़ी टेंशन

रांची: झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाला चुनाव अब बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। चुनावी मैदान में उद्योगपति परिमल नथवानी के निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उतरने के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। जिस मुकाबले को अब तक आसान माना जा रहा था, वह अब पूरी तरह रोमांचक हो गया है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि परिमल नथवानी की उम्मीदवारी ने कांग्रेस की रणनीति को झटका दिया है। कांग्रेस जहां अपने उम्मीदवार प्रणव झा की जीत को लेकर आश्वस्त दिखाई दे रही थी, वहीं अब उसे अपने विधायकों की एकजुटता बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

दिल्ली से लौटे, बदले समीकरण

सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा प्रस्तावक बनने से इनकार किए जाने के बाद परिमल नथवानी ने दिल्ली का रुख किया। वहां हुई राजनीतिक मुलाकातों और रणनीतिक चर्चाओं के बाद वे रांची लौटे और उनकी उम्मीदवारी को नई मजबूती मिलती दिखाई दी। भाजपा के समर्थन की चर्चाओं ने चुनावी मुकाबले को और रोचक बना दिया है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि नथवानी को भाजपा का पूरा समर्थन मिलता है, तो उन्हें जीत के लिए अतिरिक्त कुछ वोटों की जरूरत होगी। ऐसे में चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग और राजनीतिक रणनीतियों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी परीक्षा

दूसरी ओर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने सभी विधायकों को एकजुट रखना है। पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता कि चुनाव के दौरान कोई भी वोट इधर-उधर जाए, क्योंकि इसका सीधा असर पार्टी की राजनीतिक साख पर पड़ सकता है।

इसी वजह से कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह सक्रिय हो गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पर्यवेक्षक लगातार रांची में डेरा डाले हुए हैं और गठबंधन सहयोगियों के साथ बैठकें कर रहे हैं।

जेएमएम की संतुलित रणनीति

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने इस पूरे मामले में संतुलित रणनीति अपनाई है। पार्टी न तो खुलकर किसी विवाद में पड़ना चाहती है और न ही गठबंधन की एकजुटता पर कोई असर आने देना चाहती है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पहले भी यह संकेत दे चुके थे कि राज्यसभा चुनाव में गठबंधन को रणनीतिक रूप से आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि कांग्रेस अपने उम्मीदवार को मैदान में उतारने पर अडिग रही।

18 जून पर टिकी नजरें

अब सभी की निगाहें 18 जून को होने वाली वोटिंग पर टिकी हैं। चुनाव परिणाम सिर्फ राज्यसभा की सीटों का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि झारखंड की गठबंधन राजनीति कितनी मजबूत है और कौन सा दल अपने विधायकों को एकजुट रखने में सफल रहता है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस बार का राज्यसभा चुनाव संख्या बल से ज्यादा रणनीति, प्रबंधन और राजनीतिक विश्वास की परीक्षा बन चुका है।

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