
राज्यसभा चुनाव: बैद्यनाथ राम पर दांव, हेमंत सोरेन का कार्यकर्ताओं और SC समाज को बड़ा संदेश
रांची: झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने राज्यसभा चुनाव 2026 के लिए पूर्व विधायक बैद्यनाथ राम को उम्मीदवार बनाकर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह फैसला केवल एक उम्मीदवार चयन नहीं, बल्कि संगठन, सामाजिक समीकरण और नेतृत्व शैली को लेकर स्पष्ट संकेत भी है।
परिवारवाद से अलग दिखाने की कोशिश
जिस राज्यसभा सीट के लिए बैद्यनाथ राम को उम्मीदवार बनाया गया है, वह झामुमो संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय शिबू सोरेन के निधन के बाद रिक्त हुई थी। राजनीतिक तौर पर यह सीट बेहद भावनात्मक और प्रतिष्ठित मानी जाती है।
ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन चाहें तो परिवार के किसी सदस्य को उम्मीदवार बना सकते थे, लेकिन उन्होंने संगठन से जुड़े एक पुराने कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता को प्राथमिकता दी। इसे पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सकारात्मक संदेश देने वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है।
कार्यकर्ताओं का बढ़ेगा मनोबल
झामुमो नेतृत्व पहले भी संगठन से जुड़े नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देता रहा है। वर्ष 2022 में महुआ माजी और 2024 में डॉ. सरफराज अहमद को राज्यसभा भेजकर पार्टी ने यह संकेत दिया था कि संगठन में काम करने वालों को अवसर दिया जाएगा।
बैद्यनाथ राम का चयन उसी रणनीति की अगली कड़ी माना जा रहा है। इससे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ने की संभावना है।
अनुसूचित जाति समाज पर फोकस
बैद्यनाथ राम अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं और लातेहार विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक रह चुके हैं। उन्हें राज्यसभा उम्मीदवार बनाकर झामुमो ने अनुसूचित जाति समाज को भी एक मजबूत राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।
झारखंड विधानसभा की 81 सीटों में 9 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। वर्तमान में इन सीटों पर भाजपा, झामुमो, कांग्रेस, राजद और लोजपा के विधायक निर्वाचित हैं। ऐसे में आगामी चुनावी राजनीति को देखते हुए यह फैसला रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आदिवासी आधार के बाद SC वर्ग में विस्तार की रणनीति
झामुमो की सबसे मजबूत पकड़ अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों में मानी जाती है। राज्य की 28 अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीटों में से 21 सीटों पर झामुमो का कब्जा है। ऐसे में पार्टी अब अपने सामाजिक आधार को और व्यापक बनाने की दिशा में काम करती दिख रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बैद्यनाथ राम को राज्यसभा भेजने का फैसला केवल वर्तमान चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 2029 की राजनीतिक तैयारी और सामाजिक विस्तार की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
कई संदेश देने वाला फैसला
बैद्यनाथ राम की उम्मीदवारी से झामुमो ने एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है—संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान, परिवारवाद से दूरी का संकेत और अनुसूचित जाति समाज में राजनीतिक पहुंच बढ़ाने का प्रयास। अब देखना होगा कि इस फैसले का असर आने वाले चुनावों और सामाजिक समीकरणों पर कितना पड़ता है।



