
झारखंड में ‘लेटर पॉलिटिक्स’ तेज: भाषा विवाद पर मंत्री राधाकृष्ण किशोर की चिट्ठी से बढ़ी सियासी हलचल
रांची: झारखंड की राजनीति में इन दिनों “लेटर पॉलिटिक्स” सबसे बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है। इस सियासी चिट्ठीबाजी के केंद्र में एक बार फिर राज्य के मंत्री राधाकृष्ण किशोर हैं। उन्होंने इस बार झारखंड कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश को पत्र लिखकर भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषा विवाद पर पार्टी का आधिकारिक रुख पूछ लिया है। मंत्री की इस चिट्ठी ने न सिर्फ भाषा विवाद को फिर गर्म कर दिया है, बल्कि कांग्रेस और गठबंधन सरकार के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान को भी सामने ला दिया है।
JTET भाषा विवाद से बढ़ी राजनीति
दरअसल पूरा मामला झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) से जुड़ा है। भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषाओं को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। इस विवाद को सुलझाने के लिए सरकार ने हाल ही में पांच मंत्रियों की एक हाई लेवल कमिटी बनाई है, जिसका समन्वयक राधाकृष्ण किशोर को बनाया गया है। कमिटी की पहली बैठक 17 मई को प्रस्तावित है।
लेकिन बैठक से पहले ही मंत्री जी की चिट्ठी ने राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया है।
“कांग्रेस का आधिकारिक स्टैंड क्या है?”
राधाकृष्ण किशोर ने अपने पत्र में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष से साफ पूछा है कि भाषा विवाद पर पार्टी का आधिकारिक रुख क्या है। उन्होंने लिखा कि कमिटी आगे की कार्रवाई उसी आधार पर तय करेगी।
मंत्री ने पत्र में यह भी कहा कि झारखंड के कई जिलों—गोड्डा, धनबाद, चतरा, गिरिडीह, कोडरमा, पलामू, गढ़वा और बोकारो—में बड़ी संख्या में लोग भोजपुरी, मगही और अंगिका बोलते हैं। ऐसे में इन भाषाओं को JTET से बाहर करना सवाल खड़े करता है।
कार्मिक विभाग से भी मांगा जवाब
मंत्री ने केवल राजनीतिक सवाल ही नहीं उठाए, बल्कि कार्मिक विभाग से भी कई अहम जानकारियां मांगी हैं। उन्होंने पूछा है कि:
- राज्य में भोजपुरी, मगही और अंगिका बोलने वालों की वास्तविक संख्या क्या है?
- जब 2012 तक JTET नियमावली में ये भाषाएं शामिल थीं, तो 2025-26 में इन्हें हटाने का आधार क्या है?
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि 17 मई की बैठक में सभी जरूरी आंकड़ों और जवाबों के साथ मौजूद रहें।
कांग्रेस के भीतर बढ़ी असहजता
मंत्री की चिट्ठी पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस मुद्दे पर फैसला पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी की बैठक में लिया जाएगा।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मंत्री ने अपना पक्ष पहले ही सार्वजनिक कर दिया, जबकि पार्टी के भीतर इस पर कोई औपचारिक चर्चा नहीं हुई थी। इस बयान ने साफ संकेत दे दिया कि पार्टी और मंत्री के बीच तालमेल पूरी तरह सहज नहीं है।
पहले भी उठ चुका है विवाद
यह विवाद नया नहीं है। JTET नियमावली जब पहली बार कैबिनेट में लाई गई थी, तब मंत्री राधाकृष्ण किशोर और दीपिका पांडेय सिंह ने भोजपुरी, मगही और अंगिका को हटाने पर आपत्ति जताई थी। उस समय मामला टाल दिया गया था।
लेकिन अगली कैबिनेट बैठक में राधाकृष्ण किशोर अनुपस्थित रहे और नियमावली पास हो गई। इसके बाद संगठन के भीतर विरोध शुरू हुआ, फिर यह मुद्दा सड़क तक पहुंचा और आखिरकार सरकार को कमिटी बनानी पड़ी।
अब सिर्फ भाषा नहीं, राजनीति भी दांव पर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मामला अब केवल भाषा तक सीमित नहीं रह गया है। यह कांग्रेस के भीतर बढ़ते मतभेद और गठबंधन सरकार के अंदर चल रही खींचतान का भी संकेत बनता जा रहा है।
अब सबकी नजर 17 मई को होने वाली कमिटी की बैठक पर टिकी है। देखना दिलचस्प होगा कि सरकार भोजपुरी, मगही और अंगिका को JTET में फिर से शामिल करती है या यह विवाद झारखंड की राजनीति में और बड़ा रूप लेता है।



