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दो ‘हेमंत’ की जंग; क्या असम में सरमा के चक्रव्यूह को भेद पाएंगे सोरेन?hemnathhhhhhhhhhhhhhhfggsasdvvvvvvvvxxxxxxxxavhghhggggggggggggggggggggggggggggggg+

राजनीति में कहावत है कि ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है’, लेकिन झारखंड और असम के संदर्भ में यह जुमला अब ‘दुश्मन के घर में सेंधमारी’ की शक्ल ले चुका है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का हालिया असम दौरा महज एक सांस्कृतिक मुलाकात नहीं, बल्कि 2026 के असम विधानसभा चुनावों से पहले एक सोची-समझी राजनीतिक बिसात है। यह सीधे तौर पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के उस ‘झारखंड मिशन’ का जवाब है, जो उन्होंने 2024 के झारखंड चुनावों के दौरान चलाया था।
बदला या बिसात: फ्लैशबैक 2024
याद कीजिए 2024 का झारखंड विधानसभा चुनाव, जब बीजेपी ने हिमंत बिस्वा सरमा को चुनाव प्रभारी बनाकर मैदान में उतारा था। सरमा ने संथाल परगना में ‘डेमोग्राफी चेंज’ और ‘घुसपैठ’ को मुख्य मुद्दा बनाकर चुनाव को पूरी तरह ध्रुवीकरण की धुरी पर घुमाने की कोशिश की थी। हालांकि, उनके तीखे हमलों का नतीजा बीजेपी के लिए सुखद नहीं रहा। आदिवासी वोट बैंक ने एकजुट होकर JMM पर भरोसा जताया और बीजेपी को आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों पर करारी शिकस्त झेलनी पड़ी।
अब ठीक दो साल बाद, हेमंत सोरेन उसी अपमान और राजनीतिक हमले का हिसाब चुकता करने असम की धरती पर खड़े हैं।
तिनसुकिया की गर्जना और ‘झारखंडी’ कनेक्शन
फरवरी 2026 में तिनसुकिया की ’21वीं आदिवासी महासभा’ में हेमंत सोरेन की मौजूदगी ने कई संकेत दिए हैं। असम में करीब 13% आदिवासी आबादी है, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा मुंडा, ओरांव, संथाल और खड़िया समुदायों का है। ये वे लोग हैं जिनके पूर्वज कभी झारखंड से जाकर असम के चाय बागानों में बस गए थे।
हेमंत सोरेन ने इस ‘इमोशनल कार्ड’ को बखूबी खेला है। जब वह कहते हैं कि “असम सरकार आदिवासियों पर अत्याचार बंद करे, वरना झारखंड से आदिवासियों की सेना असम कूच करेगी”, तो वह खुद को केवल एक राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि देश के सबसे बड़े आदिवासी चेहरे के रूप में स्थापित कर रहे होते हैं।
क्या JMM असम में ‘किंगमेकर’ बनेगी?
असम की 126 विधानसभा सीटों में से लगभग 40 सीटों पर आदिवासी और चाय बागान श्रमिकों का सीधा प्रभाव है।
* वोट बैंक की ताकत: असम में करीब 38 लाख आदिवासी मतदाता हैं।
* रणनीतिक बढ़त: अगर सोरेन इन मतदाताओं को एकजुट करने में सफल रहते हैं, तो वह हिमंत बिस्वा सरमा के अभेद्य किले में बड़ा ‘डेंट’ लगा सकते हैं।
* काउंटर अटैक: यह सरमा के उसी ‘आउटसाइडर’ नैरेटिव का जवाब है, जो उन्होंने झारखंड में गढ़ा था।
निष्कर्ष
हेमंत सोरेन का असम में बढ़ता दखल यह साफ करता है कि अब आदिवासी राजनीति क्षेत्रीय सीमाओं को लांघकर राष्ट्रीय स्वरूप ले रही है। क्या JMM असम में कोई चमत्कार कर पाएगी? यह तो अप्रैल-मई 2026 के नतीजे बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि हेमंत सोरेन ने हिमंत बिस्वा सरमा को उनके ही गढ़ में घेरकर मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है। झारखंड के ‘दिसुम गुरु’ के वारिस अब पूर्वोत्तर की राजनीति की नई पटकथा लिख रहे हैं

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