मौत के कुएं से पानी ला रहीं मासूम बच्चियां! खरगोन में जल संकट की भयावह तस्वीर
खरगोन: जरा इन तस्वीरों को गौर से देखिए… पथरीली ढलान पर खड़ी छोटी बच्चियां, हाथ में प्लास्टिक की बाल्टी, सिर पर मटका और नीचे गहरे गड्ढे में जमा गंदा पानी। यह किसी रेगिस्तान का दृश्य नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के भगवानपुरा इलाके का सच है।
सरबड़ और रेखलिया झीरा फलिया जैसे गांवों में पानी का संकट इतना गहरा गया है कि लोग सूखी नदी की तलहटी में गड्ढा खोदकर पानी निकालने को मजबूर हैं। हालात ऐसे हैं कि सुबह 4 बजे से ही पानी भरने के लिए लाइन लग जाती है, क्योंकि देर होने पर गड्ढों का पानी खत्म हो जाता है।
मौत को मात देकर पानी ला रहीं बच्चियां
इन गांवों में छोटी-छोटी बच्चियां जान जोखिम में डालकर रस्सी के सहारे नीचे उतरती हैं। नीचे पत्थरों से भरी ढलान और ऊपर से फिसलन भरा रास्ता… अगर एक बार भी पैर फिसला तो बड़ा हादसा हो सकता है।
लेकिन मजबूरी ऐसी है कि डर से ज्यादा जरूरी पानी हो गया है। बच्चियां गंदा और मटमैला पानी भरकर सिर पर रखती हैं और फिर ऊपर चढ़ती हैं ताकि घर में पीने और रोजमर्रा के काम के लिए पानी पहुंच सके।
किताबों की जगह हाथों में बाल्टी
सबसे दर्दनाक तस्वीर यह है कि जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, उनमें अब पानी की बाल्टियां दिखाई दे रही हैं। गांव के लोग बताते हैं कि गर्मियों में बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित हो जाती है, क्योंकि दिन का बड़ा हिस्सा सिर्फ पानी लाने में निकल जाता है।
दूषित पानी पीने से गांव में बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है, लेकिन लोगों के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा है।
“हर घर जल” योजना पर उठ रहे सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि इलाके में हैंडपंप सूख चुके हैं, कुएं जवाब दे चुके हैं और करोड़ों रुपये की नल-जल योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आती हैं।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकारी योजनाओं का लाभ इन आदिवासी और दूरदराज के इलाकों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा? हर साल गर्मियों में ऐसी तस्वीरें सामने आने के बावजूद हालात क्यों नहीं बदल रहे?
खरगोन की ये तस्वीरें सिर्फ जल संकट नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता और गांवों की बदहाल हकीकत को भी उजागर करती हैं।
